राजा दसरथ के चारों पुत्रों में भगवान श्री हरी विष्णु का अंश था, क्योंकि चारों भाई अपने पिता के पुत्रकमेष्ठि यज्ञ द्वारा उत्पन्न हुए थे। तो श्री राम ही क्यूँ सर्वश्रेष्ठ थे , इसका उत्तर हमें वाल्मीकि रामायण मैं बाल कांड के 16वे और 18वे सर्ग में देखने को मिलता है।

श्रीहरि भगवान विष्णु ने अपने को चार स्वरूपों में प्रकट करके राजा दशरथ को पिता बनाने का निश्चय किया।
उसके बाद पुत्रेष्टि यज्ञ करते हुए राजा दशरथ के यज्ञ में अग्नि कुंड से एक विशालकाय पुरुष प्रकट हुआ। उसके शरीर में इतना प्रकाश था, जिसकी कही तुलना नहीं सकती थी।
उसके हाथ में सोने से बनी हुई परात थे ,जो चांदी के ढक्कन से ढकी हुई थी। वह थाली बहुत बड़ी और दिव्य खीर से भरी हुई थी।
उसने राजा दशरथ की ओर देखकर कहा।
राजन मैं प्रजापति लोक का पुरुष हूं। और यहां प्रजापति की आज्ञा से यहां आया हु।
तब राजा दशरथ ने हाथ जोड़कर उनसे कहा – भगवन आपका स्वागत है। कहिए में आपकी क्या सेवा करूं।
फिर उस प्राजापत्य पुरुष ने कहा
राजन! आप देवताओं की आराधना करते है,इसलिए आपको यह दुर्लभ वस्तु प्राप्त हुई है।
यह देवताओं की बनाई हुई खीर है,जो संतान की प्राप्ति कराने वाली है।तुम इसे ग्रहण करो और यह खीर अपनी योग्य पत्नियों को खिला दो। इसके खाने पर उनके गर्भ से आपको अनेक पूतों की प्राप्ति होगी।
इस प्रकार देवताओं की बनाई हुई उस खीर को पाकर राजा दशरथ बहुत प्रसन्न हुए। और उस खीर को अपने अंतःपुर में ले गए जहा रनिया निवास करती है।
और उस खीर को महाराज दशरथ ने अपनी तीनो रानियों को इस प्रकार खिलाया।
उस पूरी खीर का आधा भाग उन्होंने महारानी कौशल्या को दे दिया और उस बची हुई आधी खीर का आधा भाग रानी सुमित्रा को दे दिया फिर उन दोनो के देने के बाद बची हुई खीर का आधा भाग कैकई को दे दी। उसके बाद बची हुई उस खीर को कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने सुमित्रा को फिर से दे दिया।

देवताओं की बनाई हुई खीर को खाकर तीनो महारानियों ने गर्भ धारण किया ।
यज्ञ समाप्ति के बाद जब छः ऋतुएं बीत गई तब बारहवें मास के चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र एवं कर्क लग्न में महारानी कौशल्या जी ने दिव्य लक्षणों से युक्त ,जगदीश्वर श्री राम को जन्म दिया। वह इसलिए सर्वश्रेष्ठ थे क्योंकि वह खीर के आधे भाग से प्रगट हुए थे।
उसके बाद रानी कैकई से सत्य पराक्रमी भारत का जन्म हुआ जो खीर के सबसे कम भाग से प्रगट हुए थे। यह भी समस्त गुणों से संपन्न थे।
इसके बाद रानी सुमित्रा ने लक्ष्मण और सत्रुघ्न इन दो पुत्रों को जन्म दिया। ये दोनो वीर भगवान विष्णु के अर्ध भाग से संपन्न थे।
उनके जन्म के ग्यारह दिन बीतने पर उनका नाम करण संस्कार किया। उस समय महर्षि वसिष्ठ ने प्रसन्नता के साथ चारो पुत्रों के नाम रखे। राम ,भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और उन सभी का समय समय पर राजा से जात कर्म और सभी संस्कार करवाए थे।
