धर्म की परिभाषा अगर जानने की कोशिश करेंगे तो आपको हजारों मतलब मिल जाएंगे जो लोगों ने अपने ज्ञान से बनाए होंगे।
धर्म नाही Religion है , नाही मजहब है, नाही पंत है। धर्म नाही परंपरा है , नाही विचार है और न ही कोई उपदेश है।
धर्मः एक संस्कृत शब्द है जिसका मूल शब्द ( धृ ) है , धृ का अर्थ है – धारण करना, बनाए रखना , कायम रखना ।
॥धरयाते इति धर्म:॥
आर्थतः वह धर्म ही है, जो हमे धरण करता है।

धर्म वह है जो हमें मोक्ष यानि ईश्वर की प्राप्ति में सहायता करता है। धर्म यानि कर्तव्य (duty),
विदुर नीति अध्याय 3 श्लोक 56 में महात्मा विदुर ने धर्म के 8 प्रकार के मार्ग बताएँ है।
इज्याध्ययनदानानि तपः सत्य क्षमा घृणा। अलोभ इृति मार्गोड्य धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥
अर्थात- यज्ञ, अध्ययंन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और अलोभ–ये घर्मके आठ प्रकारके मार्ग बताये गये हैं॥
इसके बाद महात्मा विदुर कहते है की, यज्ञ, अध्ययंन, दान, तप अहंकार में कोई भी रह सकता है ,लेकिन सत्य, क्षमा, दया और अलोभ में जो महात्मा नहीं है, वह नहीं रह सकते।

जब मनुष्य आठों मार्ग को आदर्श बनाकर अपना कर्तव्य करता है, तो यह उसका धर्म है।
भागवत गीता अध्याय 3 के श्लोक 35 में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है,-
श्रेयांस्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो सिद्धांत: ||
अपना कर्तव्य, जो बिना योग्यता के किया गया हो, दूसरे व्यक्ति के कर्तव्य से बेहतर है, जो अच्छी तरह से निभाया गया हो। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए मरना भी बेहतर है। दूसरे का कर्तव्य भय देनेवाला होता है।

महाभारत के 18वे पर्व के 5 वे अध्याय के 62वे श्लोक में वेद व्यास जी कहते है,-
ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे ।
धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ॥ ४९ ॥
में अपने दोनों हाथ उठा-उठा कर कह रहा हूँ की, धर्म का पालन करो उसी से ही तुम्हें अर्थ, काम, और मोक्ष की प्राप्ति होगी पर मेरी कोई सुनता ही नहीं है।