यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मासंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥3
यह श्लोक गीता के अध्याय 4 का श्लोक 7 और 8 है
– हे पार्थ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ। साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।

अवतार यानि जन्म लेना । अवतार कही से भी प्रकट नहीं होते वह प्रकृति के नियमानुसार जन्म लेते है ।दिव्यता जब आकार लेती है , और किसी न किसी रूप में अपने आप को प्रकट करती है, उसे अवतार कहते है।

अवतार
प्रश्न : अब आप लोगो के मन एक सवाल पैदा हुआ होगा , की ईश्वर तो निराकार है, सर्वव्यापी है । तो निराकार आकार कैसे ले सकता है
उत्तर : वास्तव में निराकार ही आकार ले सकता है । सृष्टि की रचना से पहले सभी प्रकृति और सभी जीव निराकार थे, पर वह सभी ने आकार लिया, तो ईश्वर आकार क्यूँ नहीं ले सकते ,जबकि ईश्वर तो असीमित है । वह ईश्वर ही क्या जो आकार नहीं ले सकता ।
मानुस्मृति में भगवान मनु ने कहा है
आसीदीदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्। अप्रतक्रर्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः॥1.5॥ ततः स्वयंभूर्भगवानव्यक्तो व्यंज्यन्निदम्।महाभूतादि वृत्तौजा: प्रादुरासीत्तमोनुद:॥1.6॥ योSसावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोSव्यक्त:सनातनः। सर्वभूतमयोSचिन्तयः स एवं बीजमवासृजत्॥1.7॥
अर्थात
यह संसार अपनी उत्पत्ति के पूर्व अन्धकारमय था, अज्ञात था, इसका कोई लक्षण नहीं था। किसी भी अनुमान से यह जानने योग्य नहीं था। चारों ओर से मानो सोया हुआ था। इस महाप्रलय स्थिति के अनन्तर, सृष्टि के प्रारम्भ में, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश आदि विश्व को सूक्ष्म एवं स्थूल रूप में प्रकट करने की इच्छा से अतीन्द्रिय, महासूक्ष्म, नित्य, विश्वव्यापक, अचिन्त्य परमात्मा ने अपने आप को प्रकट किया अर्थात् महत्तत्त्व आदि की उत्पत्ति द्वारा अपनी शक्ति को संसार में प्रकट किया। उसके पाश्चात्य अनेक प्रकार की प्रजा सृष्टि की इच्छा से जल वृष्टि करके उसमें अपना शक्ति रूप बीज स्थापित किया । ॥ ५-८ ॥

जब हम सभी में ईश्वर का अंश है, तो हम सभी ईश्वर के अवतार ही है। अंतर इतना ही है की , हमारे गुण और कर्म यानि कार्य अच्छे नहीं है। हम सभी अपने नश्वर कार्यों में इतने मग्न है , की अपना वास्तविक रूप नहीं पहचान रहे है । हम सभी इतने भ्रष्ट की हम हमारे जन्म का उद्देश्य ही भूल गए है । इसलिए हमें ऐसे कर्म करने चाहिए जिससे हम ईश्वरत्व की प्राप्ति हो यानि मोक्ष की जो मनुष्य का अंतिम लक्ष्य है ।
THE ULTIMATE GOAL OF HUMAN BIRTH IS MOKSH
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